प्रात:कालीनविनंती सायंकालीन प्रार्थना

About Mahan Tyagi Baba Jumdevji

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनका जन्म 3 एप्रिल1921 मे नागपूर शहर के गोलीबार चौक स्थित अत्यंत गरिब बुनकर हलबा समाज के परिवार मे हुआ।उनका पालन-पोषण पिताजी विठोबा व मा सरस्वतीबा इन्होने किया।बाबा बचपन अत्यंत गरिब परिस्थिति मे हुआ।महान त्यागी बाबाजुमदेवजी को कुल पांच भाइ थे ।1)  बालकृश्ण 2) नारायण , 3) जागोबा ,  4) जुमदेव,  5)मारोती यह भाइ लोग थे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनके परिवार का मुख्य व्यवसाय बुनकरी था।वह खुद कपडा बुनकरी का काम करते थे और स्वंयम ही उसकी बिक्री करते थे।इतनी सब मेहनत करने  के बाद भी उनको सिर्फ जिवन के लिए आवश्यक इतनी हो कमाइ होती थी और वह उस मे खुश रहते थे।उसी प्रकार बाबा कुछ दिन तक सोने के व्यापारी के यहा भी काम किया करतेथे,कुछ दिनो बाद उन्होने नागपुर पालिका मे ठेकेदारी का काम किया।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी यह एक ख्याती प्राप्त कुश्ती के पहेलवान थे, उनको जुमन पहेलवान के नाम से परिसर के लोग जानते थे।उन्होने अनेक कुश्ती के सामने जितकर विजय प्राप्त की है।बाबा जुमदेवजी ने सिर्फ चार कक्षा तक शिक्षा  प्राप्त की गरिब परिस्थिति की वजह से वे ज्यादा पढ नही पाये।इस बात का खेद उन्हे हमेशा रहता था।इसका गहरा परिणाम उन पर होने लगा इसिलिए उन्होंने अपने पुत्र को अत्यंत कठिन व गरिब परिस्थिति मे शिक्षा प्राप्त कराइ इसलिए उन्होने अपना घर गिरवी रखकर उन्होंने इंजिनिअरिंग से यु.स.ए.मे पी.एच.डी. तक के शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया वह आज डा. मनो ठुब्रीकर के नाम से जाने जाते है।महान त्यागी बाबाजुमदेवजी अपने परिवार के सदस्यो पर अत्यंत प्रेम करते थे, उसी प्रकार अपने छोटे भाइ (मारोती) पर भी अत्यंत प्रेम था और मारोती भी उनके शब्द के बाहर नही जाते थे।सखुबाइ यह हमेशा वाराणसी बाइ के साथ प्रेम से रहते थे उन दोनो मे भी कभी वाद-विवाद नही होता था।अपना परिवार सुखी व समाधानी करने के लिए बाबा ने एक भगवंत की प्राप्ती की उसके पश्चात बाबा ने जब द्वेष के दुखी और असामाधानी लोग देखे तब उन्होने यह कृपा निस्वार्थ भाव से प्रदान की और उनका जिवन सुधारने का प्रयत्न किया।उसी प्रकार उन्होने अनेक संस्था स्थापन किये (जैसे की बक, मंडल, दुधडेअरी, ग्राहकभंडार, धमार् थदवाखाना) और मानव धर्म की नींव रखी।मानव धर्म की स्थापना कर गरिब अंधश्रध्दा ग्रस्त व अशिक्षित लोगो का कल्याण किया।

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनका परिवार बहुत बडा था। वह पाच भाइ और तीन बहने थे। वह सब एक साथ रहते थे। कुछ समय पश्चात वह अलग अलग रहने लगे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनका विवाह नागपूर जिल्हा के खापा के प्रतिष्ट नागरिक सोमाजी बुरडे इनकी बहेन वाराणसीबाइ इनके साथ हुआ।उन्हे प्रथम एक पुत्री (कमला) प्राप्त हूइ पर उन दिनो देवी की छुत वाली बिमारी चल रही थी,तभी देवी की बिमारी से ग्रस्त हो गयी और उनकी मृत्यु हो गयी ।महादेव यह उनके दुसरे अपत्य हे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने बडे कष्ट से उच्च शिक्षा देकर अमेरिका मे डाक्टर बनाया।आज वे डा. मनो ठुब्रीकर के नाम से जाने जाते है । आज डा.मनो ठुब्रीकर यह अमीरिका मे विविध पद पर रह के अमरिका के विधाथ्र्यीयो को उच्च शिक्षा प्रदान कि है।डा.मनो ठुब्रीकर इन का विवाह नागपूर के बर्डी परिसर मे रहने वाले श्रीस्वातंयवीर बालाजी पटेकर इनकी तिसरी कन्या श्रीमती सुधाबाइ इनसे हुआ ।डा. मनो ठुब्रीकर इन्हे दो अपत्ये है। उन्हे भी डा.मनो ठुब्रीकर ने उच्च शिक्षा देकर विधाषोभित किया है। उनकी प्रथम कन्या वैषाली और चिरंजीव विषाल है। वैषाली एम.एस.सी(मथस) तक शिक्षा प्राप्त है। अभी उनका विवाह हो के वह अपना वैवाहिक जिवन श्री समीर वाडके इनके साथ ख़ुशी से व्यतीत कर रही है। समीर वाडके यह एम.बी.ए.तक पढाइ कर अमरिका मे अपना खुद का व्यवसाय करते है।उसी प्रकार डा. मनो ठुब्रीकर इनके दुसरे अपत्य डा. विषाल ठुब्रीकर यह मेडिकल प्रक्टीषनस के अमरिका के प्रतिष्ट हास्पीटल मे डाक्टर है और वह लोगो की सेवा कर रहे है।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इन्हे अपने परिवार पर अत्यंत प्रेम था। उन्होने अपने बंधुओ को कभी अपने से दूर नही किया पर बाबा को अपने छोटे भाइ से बहुत ज्यादा लगाव था। वह हमेशा उनके साथ एक ही घर मे रहे।बाबा व मारोतरावजी का परिवार एक ही घर में रहकर एक दुसरे को सहाय्यता करते थे। उन्हमे कभी भी वाद-विवाद नही रहता था। वैसे ही मारोतराव व उनका परिवार बाबा के शब्दो के आगे नही जाते थे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनको परिवार के सदस्य दाजी करके बुलाते थे। वैसे ही वाराणसी आइको दादामाइ करके बुलाते थे।

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी यह एक बुनकर व गरिब परिवार में जन्मे थे। उन्हंने अपने जिवन में अनेक प्रकार के दुख:द प्रसंग देखे।परिवार के सदस्यं कुछ ज्यादा ही अंधश्रदधाग्रस्त थे। जो महान त्यागी बाबा जुमदेवजी को कभी भी उचित नही लगता था। बाबा अपना पारिवारिक धंदा बुनकरी करते थे।इसी बीच उन्होने कुछ दिन तक एक सोनार के यहा भी नौकरी की।उसके उपरांत कुछ वर्ष महानगरपालिका मे सिव्हील ठेकेदारी का काम भी किया। महान त्यागी बाबा जुमदेवजी अत्यंत मेहनती थे। उन्हें ज्ञान था कि अपने परिवार को किस प्रकार सहाय्यता करना है और परिवार के लोग भी उन्हे मान सम्मान देते थे।वह पाच बंधुओ मे चतुर्थ स्थान के बंधु होते हुए भी, उनके परिवार के सभी सदस्य दाजी के नाम से बुलाते थे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी यह एक प्रख्यात पहेलवान थे उन्हे जुम्मन पहेलवान नाम से जाना जाता था।बाबा अपना पूरा परिवार संभालते थे, कभी भी परिवार के सदस्यं को उच्च निच्च का दर्जा नही देते थे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी को पूरे परिवार ने साथ दिया।वैसेहि बाबा ने अपने परिवार को सुखी करने के लिए सर्वोपरि प्रयत्न किए ,महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने एक भगवंत कि प्राप्ती कर प्रथम अपने परिवार को दु:ख से दूर किया उसके बाद बाबा ने भगवत कृपा सभी सेवको को बिना मुल्य देकर उनका जिवन सुखी व समृध्द बनाया।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने अपने पुत्र को उच्च शिक्षा देकर अमेरिका भेजा।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी हमेशा कहते थे कि प्रपंच साधकर परमेश्वर कार्य करना चाहिए, महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने अपने सेवको को लिए बहुत सी संस्थाए स्थापन कि जिससे मार्ग के सेंवको की शैक्षणिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति मे सुधार आये। इसलिए बाबा ने जी-जान से प्रयत्न किया, वह खुद धुप में, बारिश में, पैदल चलकर उन्होने संस्था स्थापन करने के लिए चार पैसे जमाने के लिए कहा से कहा जाते थे।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने इकठठा हुआ एक भी पैसा अपने पास नही रखा जमा हुआ पुरा पैसा सेवको के लिए जो संस्था स्थापन कि उसे दे दिया। महान त्यागी बाबा जुमदेवजी जो भी संस्था मे जाते थे वहां पर एक कप चाय भी संस्था के पैसे से नही पिते थे।वह स्वंयम अपने पैसौ से अपने लिए व उनके साथ रहने वाले सेंवको के लिए चाय बुलाते थे, इस प्रकार बाबा जुमदेवजी ने निश्काम सेवा की ।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी के सुपुत्र डा. मनो ठुब्रीकर अमेरिका मे अपने नोकरी हेतुं रहते थे, तभी बाबा तिन बार अमेरिका जाकर आये वैसे ही दो बार मातोश्री वाराणसीआइ भी अमेरिका जा के आ चुकी थी।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी को ज्ञात था कि, मनुष्य ने जन्म लिया तो उसकी मृत्यू भी अटल है। महान त्यागी बाबा जुमदेवजीने सेवको के लिए अत्याधिक परिश्रम किये, समय पे भोजन न लेने के वजह से उन्हें मधुमेह हो गया था और उनके छाती मे दर्द होना षुरू हो गया था।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी यह जब दुसरी बार अपने सुपुत्र के पास अमेरिका गये तभी मातोश्री वाराणसीआइ यह भी उनके साथ गयी थी।परंतु दुभ्र्यागवष वहां के हवामान से वह अत्यंत बीमार हो गयी थी, उन्हे वापस नागपूर लाया गया उस समय बाबा को मातोश्री वाराणसीआइ की बेहद चिंता लगी रहती थी।उन्हे रात-रात भर निंद नही आती थी।उन्हे हमेषा प्रष्न पडा रहता था कि, अगर मातोश्री वाराणसीआइ को कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा।मेरा ध्यान कौन रखेगा, यह सभी प्रष्नो से वह चितिंत हो गये थे।तभीडा. मनो ठुब्रीकर यह हमेषा उनको धीर दिया करते थे व प्रेरित किया करते थे।अ:त मातोश्री वाराणसीआइ दिनांक 31 जुर्ले1990 मे उनकी आत्मा परमेष्वर मे विलिन हो गयी।बाबा को अपनी पत्नी के लिये बेहद प्रेम था।  उस दिन वह बहुत हताष व नाराज बैठे हुए थे,  डा. मनो ठुब्रीकर इनका भी सब्र का पहाड फुट चुका था।उन्हे भी रोना आ रहा था, उन्हे अपने माता के लिये बहुत बुरा लग रहा था।वैसे वह कह रहे थे कि, माने अपनी आयु बाबा को मिले इसिलीए वह हमेषा परमेष्वर के पास प्रार्थना करती थी।क्योंकि उन्हे हमेषा लगता था कि, बाबा ने अपने सेवको का जिवन समाज मे उच्चाकरने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।और इसी का परिणाम मातोश्री वाराणसीआइ का आयुश्य कम होकर उनका आयुशय बाबा को मिला।मातोश्री वाराणसी आइ का मानव धर्म मे योगदान अमुल्य व महत्वपुर्ण है।मातोश्री वाराणसी आइ इनके मृत्यू पश्चात बाबा को चिंता लगने लगी कि,  अब उनकी देखभाल कौन करेगा।उस समय डा. मनो ठुब्रीकर नागपूर मे ही थे।  उन्होने बाबा को अमेरिका चलने का और वही स्थापित होने का आग्रह किया पर बाबा ने साफ षब्दो मेे कहा कि, मै अपना घर व सेवको को छोड के अमेरिका नही जाऊंगा, उसके बाद डा. साहब व बाबा के परिवार के सदस्य व मंडल के लोगो की एक बैठक ली और प्रस्ताव रखा, अभी बाबा कि देखभाल कोन करेगा? उस पर मंडल के लोगो ने कहा की,बाबा ने अपना घर छोडकर मंडल   के भवन मे रहना चाहिए, तभी बाबा बेहद गुस्सा हुए और कहने लगे ''मैअपना निंवास स्थान छोडकर कही भी नही जाऊंगा।भगवान की प्राप्ती मैने अपने निवास स्थान मे ही की है।इसिलिए निंवास स्थान छोडने का प्रष्न ही नही आता और मै निंवास स्थान छोड के कही भी नही जाऊंगा।तभी बाबा के परिवार के कुछ सदस्य कहने लगे की, बाबा ने4-4 दिन परिवार के एक सदस्य के यहां सुबह व षाम के भोजन के लिए आए।तभी बाबा अत्यंत संतप्त हुए और कहने लगे की, 'मै किसी के तुकडो का मौताज नही हुं।उसी समय रमेषभाऊ ठुब्रीकर (बाबा के छोटे बंधु मारोती इन के पुत्र) यह एक घर के कोने मे चुपचाप बैठे हुए थे।उस समय बाबा ने संतप्त हो के उन्हे पुछा की, ''रमेष तु क्यं चुप बैठा है, तु क्यं  कुछ नही बोल रहा है, उस पर रमेष भाऊ बोले 'बाबा तुम जो निर्णय लोगें वह मुझे मान्य है।रमेष भाऊ सुन्न हो गये थे।तभी बाबा ने खुद उन्हे कहा 'तु क्यों ऐसा नही कहता कि तुम हमारे पास रहो बाबा, तभी रमेषभाऊ बोले ''बाबा मै एक छोटी सी नौकरी करने वाला मनुश्यहु, बहुत बार मुझे काम के निमित्य बाहर गांव रहना पडता है। मुझे भी तीन बच्चे है उन्हे भी मुझे संभालना पडता है तो मै इस परिसिथती मे आपको कैसे खुष रख सकता हु।तभी बाबा स्वयंम बोले,  'तु मुझे जैसा रखेगा मै वैसा रहुंगा जो तु मुझेचटनी-भाकरी देगा वो मै खाऊंगा मै तुझसे कभी भी षुग्रास भोजन की अपेक्षा नही रखुंगा, अभी मेरी देखभाल की पुरी जिम्मेंदारी तेरी ही रहेगी।बाबा के यह षब्द सुनकर रमेषभाऊ को थोडी तसल्ली मीली और रमेषभाऊ व उनकी पत्नी विठाबाइ बाबा की देखभाल करने लगे।रमेषभाऊ व विठाबाइ जो अपने घर चटनी भाकर खाते थे वही बाबा भी मिझासन करते हुए ग्रहन करते थे।रमेषभाऊ जब भी काम के निमित्य बाहर गाव जाते थे, तभी विठाबाइ बाबा का पुरी तरह ध्यान रखती थी। उन्होने बाबा को किसी भी तरह की कमी नही पडने दी और बाबा भी विठाबाइ को किसी चिज के लिए टोकते नही थे। विठाबाइ हमेषा बाबा को अपने बच्चे जैसा ख्याल रखती थी।रमेषभाऊ व विठाबाइ यह खुद को बेहद धन्य समझते थे कि, हमे बाबा की सेवा करने का मौका मिला।            मातोश्री वाराणसीआइ के देहांत पश्चात बाबा ने मानव धर्म का प्रचार चालु रखा, इसलिए उन्हे हमेषा गांव-गांव जाना पडता था। एक बार एसे ही मानव धर्म के प्रचार के लिए ग्राम मे गए थे तभी उनके पैर को जख्म लग गइ और उनके पैर के अंगुठे से रक्त निकला था, बाबा ने इस बात पर दुर्लक्ष करके मानव धर्म का प्रसार व प्रचार षुरू रखा। बाबा ने उस जख्म पर ध्यान ही नही दिया वह हमेषा अपने सेवको की प्रगती किस प्रकार होगी इसी विचार मे मग्न रहते थे, वह उस जख्म पर दुर्लक्ष कर अपना कार्य षुरू रखा परंतु जख्म बढती ही चली गयी और आखिर वो जख्म इतनी बढ गयी कि उनका दायां पाव घुंटने तक काटना पड रहा था।इसलिए उन्हे मुंबइ के हिंदुझा हास्पीटल मे भरती किया गया।उस समय मुंबइ मे 1992 मे बाबरी मसिजद के लिए हिंदु-मुसिलम दंगे भडके हुए थे, तभी बाबा के साथ उनके परिवार से रमेषभाऊ व विठाबाइ और उनको पुत्री पुजा और कुछ सेवक उनकी मदत के लिये गये थे।  उस समय मुंबइ दंगो से जल उठी थी, पर रमेषभाऊ और बाबा का एक भी सेवक डरा नही।  श्रीरामाजी मौंदेकर इनकी कन्या व विठाबाइ की बडी बहन रेखाबाइ मुंबइ मे नौकरी निमित्य रहती थी।तभी विठाबाइ अपनी परवा न करते हुए रेखाबाइ के घर से हिंदुझा हास्पीटल तक रोजाना आना-जाना करती थी, उन्होने कभी भी अपनी जान की परवा नही की बाबा की देखभाल  करना यही उनका उददेष था।हिंदुजा हास्पीटल मे बाबा का पैर काट लिया गया और कृत्रिम पैर लगाने के लिए बाबा को अमेरिका भेजा गया, बाबा अपना खोया हुआ पैर वापिस लगने से अतिउत्साहित हो चुके थे वह फिर से मानव धर्म के कार्य मे जुट गये।परंतु बाबा की उम्र बढने की वजह से उनकी तबियत हमेषा खराब रहती थी, विठाबाइ उनके सेहत का बेहद अछी तरह ध्यान रखती थी।उन्हे मधुमेह का रोज षाम का इंजेक्षन देना, उनका पैर हमेषा स्वच्छ रखना, उन्हे हमेषा भोजन देना इत्यादी काम करती थी। एक दिन बाबा की छाती मे अचानक दर्द उठा तभी रमेषभाऊ व विठाबाइ यह बाबा को मंडल की गाडी मे बिठा के नागपुर के टावरी हास्पीटल मे भरती के लिए लेकर गए।विठाबाइ यह बाबा के लिए रोज सुबह  भोजन का डबा भेजती और रात को स्व:त रमेषभाऊ व विठाबाइ रोज ले जाते थे और उनकी प्रकृति की हाल चाल जानते थे पर नियती का खेल ही कुछ अलग ही था।बाबा 3 आक्टोंबर1996 के दिन रात को 11.00 बजे परमेष्वर मे विलिन हो गये।उनका षव सेवको के अंतिम दर्षन के लिए 4 दिन तक मंडल के सभागृह मे रखा गया और एक दिन बाबा के निवास स्थान मे रखा गया उनकी अंतिम यात् राबाबा के निवास स्थान से गंगाबाइ घाट तक ले जाया गया।बाबा के पुत्र डा. मनो ठुब्रीकर इन्होने बाबा के षरीर को मुखाअग्नी देकर बाबा का षरिर पंचतत्व मे विलिन हो गया। बाबा के अंतिम दर्षन के लिए लाखो लोगो कि भीड जीम हुइ थी यह भीड बाबा के सच्चे मानव धर्म की पावती थी उन्होने खुद के प्राणो की परवाह न करते हुए अपना पुरा जिवन अपने सेवको के लिए अर्पित कर दिया।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी के अंतयात्रा मे लगभग 1 लाख लोगो कि उपसिथती थी।

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इन्होने अपने सेवको के कल्याण के लिए अनेक संस्थाए स्थापन कि, मानवधर्म के सेवको के कल्याण हेतु उनकी आर्थिक एंव शैक्षणिक स्तर बढाने के लिए बाबा जुमदेवजी ने दिन-रात एक कर दिया,अपने पैरो कि चप्पले तक घिस डाली संस्था स्थापन करते समय ना उन्हे खाने पिने की या अपने तबीयत पे कोइ भी ध्यान नही था।  उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था मानवसेवा करना व अपना सेवक कैसे आगे जाए और उसकी शैक्षणिक व आर्थिक परस्थिति कब और कैसे ठिक होगी यही लक्ष्य सामने रख निम्नलिखित संस्थाए स्थापन की :-

1) परमपुज्य परमात्मा एक सेवक मंडल, टिमकी, नागपुर(4 डिसेंबर 1969)

2) परमात्मा एक सेवक नागरिक सहकारी बक लिमिटेड, नागपुर (4 डिसेंबर 1979)    

3) परमपुज्य परमात्मा एक ग्राहक भंडार, नागपुर     (4 जुन 1976)

4) परमपुज्य परमात्मा एक दुग्ध-संस्था, सालर्इमेंढा  (1आक्टोंबर 1978)

5) परमपुज्य परमात्मा एक दुग्ध संस्था, धोप  (1फरवरी 1981)

6) परमपुज्य परमात्मा एक सार्वजनिक दवाखान, नागपुर (29 जुन 1989)

7) महानत्यागी बाबा जुमदेवजी उगमस्थान संस्थान, टिमकी,नागपुर 

महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने जो संस्थाए स्थापित की पर वह कभी किसी भी पद पर नही रहे उन्होने सेवकों को प्राधान्य दिया।परंतु आज के परस्थिति मे महानत्यागी बाबा जुमदेवजी ने स्थापन कि हुर्इ संस्थाए बंद हो चुकी है उस के लिये सिर्फ अपने सेवक ही जिम्मेदार है।महानत्यागी बाबा जुमदेवजी इनके व्दारा चलाया गया अभियान को कही तो भी बाधा निर्माण हो गयी है जिन सेवको के लिए बाबा ने अपना जिवन त्यागा वही सेवको ने बाबा के काम मे बाधा निर्माण की है। जब बाबा के सुपुत्र डा. मनो ठुब्रीकर नागपूर मे आये तब यह सब देख के दुखी हुए और उन्होने अपने पिताजी व्दारा निर्मित मानवधर्म की संकल्पना सामने रख महान त्यागी बाबा जुमदेवजी उगमस्थान संस्थान की स्थापना की। इस माध्यम से बाबा के सेवको की शैक्षणिक, आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुधार मावन धर्म का प्रचार व प्रसार करने का एक सफल प्रयास शुरू है। सेवको के बच्चो को शिक्षा मे आनेवाली आर्थिक परस्थिति मे जो समस्याए निर्माण होती है, वह समस्या सुलझाने का प्रयत्न उगमस्थान संस्था कर रही है। 

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इन्होने एक भगवंत की प्राप्ती कर अपने परिवार के अंधश्रध्दा ग्रस्त व असमाधानी सदस्यो को सुखी व समृध्दी जिवन जिने के लिए प्रेरित किया। उसी प्रकार बाबा को प्राप्त हुए परमेष्वरी कृपा का लाभ लेके परिवारीक सदस्य अपना जिवन व्यतीत कर रहे है।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी को परमेश्वरी प्राप्ती के लिए संपुर्ण परिवार ने साथ दिया।भगवंत प्राप्ती का उद्देश ऐसा था कि, महान त्यागी बाबा जुमदेवजी यह पहले गोलीबार चौक मे ठुब्रीकर वाडे मे रहते थे।कुछ समय बाद परिवार की सदस्य संख्या बढने के वजह से महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इनके पिताजी श्री विठोबा इन्होने टिमकी परिसर मे(अभी का निवास स्थान) मकान लिया ।उनका पुरा परिवार यहा रहता था,यह मकान भुत-बाधा से बाधित रहने के वजह से पुरा परिवार तंग आ चुका था।उन्हे अनेक प्रकार की परेशानी हो रही थी जैसे की अपने आप घडे पर घडा गिरना,अपने आप हात माग का चलना, एक सिटी बजी तो एक जिवकी मृत्यू होना,छोटे बच्चो को निंद मे रहते ही उन्हे चिटटी लग जाना,टिमकी का यह मकान दो मजली था, एसा भ्रमित होता था की कोइ परछाइ उपर से निचे जा रही हो,परिवार के सदस्यो की तबियत अत्यंत खराब रहती थी।परीवार के प्रत्येक व्यक्ती ने अपने सर्वपरि प्रयत्न कर चुके थे।उन्होने तांत्रिक-मांत्रिक, होम-हवन, पुजा मुर्गे व बकरी की बलि देने जैसे अनेक प्रकार किये,पर उन्हे कोइ भी यश प्राप्त नही हुआ और ऐसे मे ही कोइ कचरी भी चालु हो गयी थी और इसी वजह से आर्थिक परिस्थिति कमजोर होने लगी। सुख भी नही और पैसा भी नही परिस्थिति अत्यंत बिकट हो चुकी थी।लगा वो प्रयत्न हो चुका था पर क्या करे कुछ सुझ नही रहा था।एक दिन बाबा और मारोती यह दोनो हातमाग पर कपडा बुनकरी कर रहे थे,उनके साथ उनका परिवार भी बैठा हुआ था।तत्पश्च्यात एक व्यकित उनके घर आया और कहा 'तुम्हारा मकान भुत-पिशाचो से त्रस्त है और तुम कोइ उपाय क्यु नही करते? और उस व्यकित ने मौदा नजदीक एक गाव के तांत्रिक के पास जाने का सुझाव दिया।जैसे की बताया गया था, बाबा जुमदेवजी उनके बडे भाइ नारायण और जागोबाजी के साथ मौंदा नजदीक गांव जाने निकले।रास्ते से जाते अचानक एक व्यक्ती जिनका नाम भगवान था वह मिले और बाबा को अपने घर चलने का निमंत्रण दिया। पर बाबा ने उन्हे बताया कि, हमे तांत्रिक के पास जाना है तो वह व्यकित पुछने लगा कि तुम्हे क्या दु:ख है? तभी बाबा ने अपनी आप बीती बताइ तभी भगवान यह व्यक्ती ने बाबा को बताया की तुम वो तांत्रिक के पास मत जाइए क्योंकि वह तुमको लुटने के अलावा दुसरा कोइ भी काम नही करेंगा, अगर आप मेरी मानो तो तुम्हारा जिवन सुखी होगा।वह बोले मेरे पास एक मंत्र है, अगर तुमने यह विधी की तो, तुम्हारा संम्पुर्ण परिवार का जिवन सुखी व समृध्द होगा। पर यह विधी अत्यंत कठिन है विधी करते वक्त विधी करनेवाला व्यकित पागल हो सकता है या फिर मर सकता है।भगवान यह व्यकित ने पुर्णविधी बाबा को व उनके बंधुओ को समझा के बतायी, तभी बाबा को यह विधी बहुत अच्छी लगी और उन्होने यह विचार किया कि हम यह विधी साध्य करे।अभी तक इतने उपाय किये तो ये भी करने मे क्या हर्ज है, उस दिन बाबा के चेहरे पे अलग ही तेजी दिख रही थी।उसी दिन बाबा व उनके बंधु ख़ुशी-ख़ुशी नागपुर वापस आये और घर पर बैठककर भगवान इस व्यकित ने बताए गए विधि की संम्पुर्ण जानकारी अपने परिवार के सदस्यो को दि। बाबा ने अपने चारो बंधुओं को पुछा कि यह विधि कौन करेगा किसी ना किसी को तो पूरा कर लेना ही होगा,पर भगवान इस व्यकित के मार्गदर्शनानुसार अगर विधी व्यवसिथत नही हुइ तो विधी करने वाला व्यकित पागल या उसकी मृत्यू हो सकती है। इसिलिए कोइ भी बंधु सामने आने के लिए तैयार नही था।बाबा ने अपने तीनो बडे भाइयो को पुछा लेकिन कोइ तैयार नही था।पर बाबा ने अपने छोटे भाइ को नही पुछा क्योंकि, वह छोटे होने से उनको पुछने का प्रश्न ही नही था।बाबा खुद ही सामने आकर विधि करने के लिए तैयार हुए और परिवार के सदस्यों को पूछा' अगर यह विधि शुरू रहते हुए मै पागल या मेरी मृत्यू हुइ तो मेरे परिवार याने मेरे पुत्र व मेरी पत्नी की देखभाल करोंगे क्या?  और इसलिए बाबा के सभी बंधु तैयार हो गए और बाबा सर्वसंमति से विधि शुरू की। विधी शुरू रहते वक्त उन्होने एक ही बात ध्यान मे रखी की,अपना परिवार व आने वाली पिढी पुर्णत: सुखी और समृध्दी जिवन के लिए जो करना पडे वह वो करेंगे। महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने प्रथम 5 दिन लगातार रात मे हवन किये।उन दिनो एक रात मे तिन हवन करने पडते थे और एक हवन के लिये अंदाजन 3 घंटे का समय लगता था।  पहिला हवन खत्म होने के पश्चात और दुसरे हवन की तैयारी के लिए 1 घंटे का समय लगता था।ऐसे त्रित्राल हवन यानी 12 घंटो मे तिन हवन किया करते थे। इन त्रित्राल हवन के समय मे परिवार के सदस्यो की निंद भी नही होती थी।बाबा तो यह कालावधी मे पुर्ण पणे निरंकारी अवस्था मे रहते थे।सुबह के समय सुरज निकलने के पहले हनुमानजी के मंदीर मे जाके पुजा-अर्चना करते थे।हनुमानजी के मंदीर मे जाते समय उनके बंधु उनके साथ संपुर्ण पुजा का सामान लेकर जाते थे और विशेष दक्षता भी लेते थे। इस संपुर्ण विधी मे बाबा परमेश्वर से वार्ता करते थे और परमेश्वर भी उन से बातचीत करते थे।विधि के समय जब त्रित्राल हवन होता था, जब जब बाबा मंत्र पढते थे उस समय बाबा हनुमानजी अपने पुछ मे भुत-पिशाचो को पकडके हवन मे डालते थे इस प्रकार बाबा ने एक परमेश्वर प्राप्त कर पुरे परिवार को दुखदारी से दुर किया।विधी शुरू रहते वक्त बाबा व उनके परिवार के सदस्य अनेक प्रकार की सावधानिया लेते थे जैसे कि,  कोइ बाइ कि परछाइ बाबा के शरीर पे ना पडे इसिलिए वो सतत प्रयत्न करते रहते थे।बाबा के बंधु विधि शुरू रहते वक्त कोइ भी विधी मे कोइ विध्न ना आये इसलिए घर के आजु-बाजु के परिसर की रखवाली करते रहते थे। बाबा अपने छोटे बंधू (मारोती) को लेकर विधी पुर्ण करते थे, बाबा अपने छोटे भाइ को हमेशा छोटे सेवक बुलाते थे। बाबा ने अत्यंत कष्ट व वेदना सहन करते हुए एक परमेश्वर की प्राप्ती वर्ष1947 ''श्रावण वधश्रेश्ठी इस दिन को की और इस दिन से उनका संपुर्ण परिवार दुखदारी से मुक्त हुआ। भगवंत प्राप्ती के लिए बाबा के परिवार ने पुर्ण सहकार्य व अमुल्य योगदान दिए। बाबा ने भगवंत प्राप्ती होने पश्चात बाबा व उनके संपुर्ण परिवार ने सवा वर्ष त्याग के कार्य करके आखरी हवन मारोती इन के हाथो से संपन्न करवाया उस के बाद बाबा ने एक भी हवन नही किया।

  चारतत्व

''हे सेवक, मै भगवान हू,तू मानव है।मै जानता हू मानव यह बेइमान है उनमें से तू एक मानव है, भले ही तुने मुझे प्राप्त किया,मै भगवान हू, मै मानव पर कदापी विश्वास नही करता।यही शब्द टिमकी में बाबा के निवास स्थान पर परमेश्वर ने बाबा को दर्शन देते हुये कहा था,बाबा ने 'बेइमान शब्द का शोध किया और परमेश्वर को,इमानदारी और निश्काम भावना से कार्य करने का वचन दिया।परमेश्वर को दिये हुये वचन का पूर्ण रूप से पालन करते हुये बाबा ने प्रत्येक मानव को परमेश्वर के विषय में जागृत किया।महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने दो तत्व भगवान को दिया है.

'परमात्मा एक,

'मरे या जिये भगवत नाम पर।भगवान बाबा से अति प्रसन्न होकर दो तत्व बाबा को दिया।'दुख़ दारी दूर करते हुये उध्दार और 'इच्छा अनुसार भोजन इस तरह से बाबा जुमदेवजी एंव परमेश्वर के बीच अनुबन्ध हुआ। यही चार तत्व मानव धर्म के सिध्दान्त बने है।भगवत प्राप्ति के लिये, निश्काम कर्म योग साधने के लिये बाबा ने चार तत्व दिये है।

1)         परमात्मा एक:-

एक ऐसा परमेश्वर जो मानव के सभी प्रकार के दुखो को दूर कर सके इसी का शोध कार्य बाबा जुमदेवजी ने किया।परमेश्वर ने बाबा को दर्शन देते हुये कहा कि है। सेवक तू मुझे कहा देख रहा है, मै तो चौबीस घण्टे तेरे पास हू।जिस पल छुट जाऊंगा,तेरा शरीर मृत हो जायेगा बाबा जुमदेवजी सोच में पड गये कि ऐसी कौनसी चीज है, जिससे मै जिन्दा हू, उसी समय बाबा को 'आत्मा का स्मरण आया।मनुष्य से आत्मा निकल जाने से मनुश्य का शरीर मृत हो जाता है।शरीर ये नश्वर है और आत्मा अमर है। सम्पूर्ण प्राणियो की आत्मा मिलकर ''परमात्मा एक है  इसलिये परमात्मा का अंश प्रत्येक जीवात्मा मे है यही पहचान बाबा ने किया है।' परमात्मा एक आत्म जोत है जो आत्मा बाबा के पास है वही आत्मा सभी प्राणीयो मे है, यानी सभी मानव समान है, ऐसा ही बाबा समझते है।इसलिये बाबा किसी को भी अपने पैरो पर सर नही रखने देते थे क्योंकि एक आत्मा दुसरी आत्मा पर झुकेगी तो आत्मा का ही अनादर हो गाया नी परमेश्वर का अनादर होगा।आत्मा चौबीस घण्टे जागृत है और निरन्तर चैतन्य शकित है, परमेश्वर कोइ व्यकित नही है वो एक शकित है, वो अदृष्य शकित है जो हमें दिखाइ नही देती, उसके सिर्फ गुण दिखाइ देते है, यही ''परमात्मा एक है।

2)         मरे या जिये भगवत नाम पर:-

पृथ्वी पर मानव ने जन्म लिया है, फिर भी वो परमात्मा का अंश ही है।परमेश्वर ने मानव को बुद्धि प्रदान किया और अन्य गुणों का भी निर्माण किया जैसे मोह, माया, अहंकार इन अन्य गुणो से मानव स्वयं को सर्वेसर्वा समझता है और परमेश्वर को मानता नही जिससे वो स्वयं के बुद्धि का उपयोग कर इन अन्य गुणो से जल्द ही फंस जाता है और दु:खी होता है इन दु:खो के निवारण के लिये मानव कइ प्रकार के उपचार करता है परन्तु जब उसके दुख नष्ट नही हो सकते उस समय परमेश्वर की याद आती है। इसलिये बाबा जुमदेवजी हमेशा यही कहते है कि मानव सर्वेसर्वा नही है सिर्फ कर्म कर्ता प्राणी है, परमेश्वर एक शकित है।मानव ने कर्म करना चाहिये फल की आशा नही करना चाहिये फल देने वाला तो भगवान ही हैं।  मानव ने अपने जीवन में परमेश्वर को प्रिय लगने वाले ही कार्य करना चाहिये।यानी उसकी मृत्यू होने पर उसकी आत्मा परमेश्वर में विलीन होती है अन्यथा उसकी आत्मा को शांति नही मिलती। मानव ने परमेश्वर को समक्ष रखकर मानवता के कार्य करना चाहिये जिससे उसके अन्दर का अंहकार नष्ट हो जायेगा और मोह, माया में नही फसेंगा इसी को कहा गया है ''मरे या जिये भगवत नाम परं।

3)         दु:खदारी दूर करते हुये उध्दार:-

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने कहा है कि मानव अगर परमेश्वर को प्रिय लगने वाले कार्य करता है और मोह, माया अहंकार का त्याग करता है,सभी से सत्य व्यवहार करता है,  मर्यादा से चलता है और प्रेम का आचरण करता है तो मानव परमेश्वर को हमेशा प्रिय लगता है।प्राकृतिक वातावरणानुसार उसको दु:ख आता है, इस समय तो अनेक प्रकार के उपचार करता है, परन्तु परमेश्वर को सामने रखकर वो उपचार नही करता इसलिये उस के दु:ख का अन्त नही होता।अगर परमेश्वर को सामने रखकर उपचार करता है तो उसके दु:ख और परेशानिया जल्दी ही दुर हो जाती है। इसमें परमेश्वर उस को निश्चित रूप से साथ देता है और अन्त में मानव को परमेश्वर मुक्ति देता हैं और उसको मोक्ष प्राप्त होता है।  यानी मानव को परमेश्वर के चरणो में स्थान मिलता है, इस प्रकार परमेश्वर मानव के दु:ख दूर करके उसके जीवन का उध्दार करता है।

4)         इच्छा अनुसार भोजन:-

मानव के जीवन में बहुत सी बातों की आवशकता होती है, वो अपना जीवन कैसे सुखी रखे और समाधानी कैसे मिले, इस ओर सब से अधिक ध्यान आकर्षित रहता है।  ऐसी स्थिति में उसको लगने वाली आवशक चीजों की इच्छा, भगवान के सामने रखे और विनंती करे एवं उसके लिये लगन एंव निष्टा से कर्म करें तो भगवान उसकी इच्छा अवश्य पूरी करते है। इच्छा अनुसार भोजन का अर्थ ये नही होता कि जो भोजन खाने की इच्छा रखता हो वही उसे मिलना चाहिये। उसने जिस प्रकार के कार्य कि या उसी से सम्बधित इच्छा रखता उसकी इच्छा भगवान पूरी करता है।अन्यथा इच्छा पूरी नही होती महत्व की बात ये ही है कि 'इन्छा अनुसार भोजन के लिये उसी प्रकार के कर्म करना आवशक है।

तीन शब्द

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने भगवत कृपा प्राप्ति के बाद आदेश दिया कि टिमकी में स्वयं के निवास स्थान पर प्रत्येक शनिवार को शाम के समय एक भगवान की चर्चा बैठक होगी। आदेशानुसार प्रथम बाबा के कुटूम्ब के लोग शामिल हुये, इसके पश्चात जैसे-जैसे इस मार्ग में सेवक बढते गये वैसे-वैसे वो सेवक भी बैठक में उपस्थित होने लगे। इस बैठक में बाबा निराकार अवस्था में रहते थे और सेवकों को मार्गदर्शन करते थे ।मानव का जीवन ऊंचा उठना चाहिये, अपने कुटूम्ब में सत्य मर्यादा प्रेम का आचरण करना चाहिये।

बाबा ने भगवत गुणों के तीन शब्द दिये है।

1)         सत्य बोलना

2)        मर्यादा का पालन करना

3)        प्रेम के साथ व्यवहार करना

1.         सत्य बोलना-

सत्य यानी आत्मा से निकले हुये बिना भय के शब्द सामने के व्यकित पर इसका क्या परिणाम होता है, इसकी तनिक भी परवाह न कर निकाले गये शब्द सत्य है।नही तो सामने के व्यक्ति पर अपने शब्दो का बुरा परिणाम होता देखकर उस को समाधान देने वाले शब्द जो वारंवार बोले जाते है, ये सरासर झूठ बोलना होता है। ऐसे शब्दो से मानव फंसता है। मानव के गर्दन पर अगर कोइ तलवार भी चला देतो भी सत्य ही बोलना चाहिये।सत्य कडुआ होता है,  परन्तु परमेश्वर को प्रिय लगता है। इस मार्ग की जागृत कृपा सत्य है मार्ग में झूठ बोलना वज्र्य है।व्यवहारिक नियम कुछ भी हो फिर भी सत्य ही व्यवहार करना चाहिये।सत्य कार्य का डर मन में नही रखना चाहिये क्योंकि उसके लिये भगवत कृपा हमेशा साथ में रहती है।'सत्य परमेश्वर है, और परमेश्वर ही सत्य है।सत्य बोलने से अपने परिवार में मर्यादा बनी रहती है, सभी का व्यवहार प्रेम से चलता है यही भगवान का पहिला गुण' सत्य है।

2.         मर्यादा का पालन करना-

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी हमेशा मार्ग दर्शन करते है कि वो अपने परिवार में मर्यादा का पालन करें। प्रत्येक मानव को मर्यादा में रहना आवष्यक है। छोटों ने अपने से बड़ो को मर्यादा से ही बोलना चाहिये।बड़ो ने अपने से छोटो को नम्रता से बोलकर मर्यादा रखनी चाहिये ।सेवकों ने सेवको से मर्यादा से ही पेश आना चाहिये।यहां मर्यादा का अर्थ सुशिक्षित, अशिक्षित ,  गरीब और धनवान नही है, ये मर्यादा नही है, बलिक भेदभाव है।सभी सेवक परमेश्वर की नजर में समान है।बाबा ने सभी देवी-देवताओं की पूजा बन्द किया है और 'परमात्मा एक ही बताया है।यही वास्तविक मर्यादा है इसी का पालन करना चाहिये।मर्यादा का पालन करने से परिवार में आपस में प्रेम का निर्माण होता है, जिससे सभी को अपने जीवन में सुख और समाधान मिलता है।एक दुसरे के विषय में प्रेम का निर्माण होता है जिससे सत्य का व्यवहार होता है।

3.         प्रेम के साथ व्यवहार करना:-

सेवको ने अपने परिवार में सभी से प्रेम का व्यवहार करना चाहिये, किसी पर क्रोध नही करना चाहिये। कोइ अगर गलती कर रहा है तो उसे समझाकर बताना चाहिये। छोटे बच्चों को प्रेम से समझाने से उसको जल्दी समझ में आता है। परन्तु क्रोधित हुये तो उसका आत्मबल कमजोर हो जाता है, जिससे वो घबरा जाता है और मर्यादा भंग होती है। प्रेम ये भगवान को प्रिय लगने वाला गुण है। प्रत्येक मानव के मन में प्रत्येक के विषय में प्रेम होना चाहिये।

पाच नियम

महान त्यागी बाबा जुमदेवजी इन्होने मार्ग के सेवको का जिवन उत्तम तरिके से चलने के लिए व गृहस्ती उच्च आने के लिए व मानवी जीवन के उद्देश पुर्ण करने के लिए बाबा ने पाच नियम दिये है।

1.         ध्येय से एक परमेश्वर मानना।

2.         सत्य, मर्यादा व प्रेम कुटूंब मे कायम करना।

3.         अनेक वाइट व्यसन बंद करना।

उदाहरणार्थ:  शराब,टानिक, गांजा, जुआ, लाटरी, चोरी करना, मुर्गे की कात्ती, उसी प्रकार मानवी जीवन निचे लानेवाले कोइ भी बुरे व्यसन बंद करना।

4.         अपने परिवार और सेवको मे एकता कायम करना।

5.         अपना परिवार मर्यादित रखना।

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